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Judiciary

The Wire और LiveLaw के खिलाफ अवमानना याचिका में AG की अनुमति से इनकार पर दिल्ली हाईकोर्ट करेगा सुनवाई

By Samriddhi Ojha      16 May, 2026 05:02 PM      0 Comments
Delhi HC Examines AGs Refusal in Contempt Plea Against The Wire LiveLaw

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने एक याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसे वेंकटेश एस ने स्वयं न्यायालय में उपस्थित होकर दायर किया था। इस याचिका में उन्होंने 30 नवंबर 2023 को अटॉर्नी जनरल द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू करने की अनुमति देने से इनकार किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि एक अनुरोध से जुड़ी है, जो वेंकटेश एस ने The Wire, LiveLaw तथा LiveLaw के प्रबंध संपादक मनु सेबेस्टियन के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू करने के लिए किया था। यह अनुरोध उस लेख को लेकर किया गया था जिसका शीर्षक था—“How Has the Supreme Court Fared During the Modi Years?”। यह लेख अप्रैल 2019 में LiveLaw पर प्रकाशित हुआ था और बाद में The Wire द्वारा पुनः प्रकाशित किया गया था।

वेंकटेश ने लेख के उन अंशों पर आपत्ति जताई थी जिनमें मोदी सरकार के पाँच वर्षों के कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट को “संकोची (timid), अनिश्चित (tentative), बिखरा हुआ (fragmented) और कमजोर (vulnerable)” बताया गया था तथा कहा गया था कि न्यायालय “केंद्र सरकार को नाराज़ करने से बचता है।”

20 अक्टूबर 2023 को अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को भेजे गए अपने अनुरोध में वेंकटेश ने तर्क दिया कि ऐसी टिप्पणियाँ सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाती हैं, न्यायालय को बदनाम करती हैं और उसकी गरिमा एवं अधिकार को कम करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि चूँकि यह लेख अब भी ऑनलाइन उपलब्ध है, इसलिए कथित अवमानना एक निरंतर चलने वाली (continuing) अवमानना है।

हालाँकि, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। अपने आदेश में उन्होंने कहा कि लेख न्यायपालिका और कार्यपालिका की भूमिका पर एक विशेष दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है और ऐसी अभिव्यक्तियाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आ सकती हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि आपराधिक अवमानना की कार्यवाही के दूरगामी परिणाम होते हैं, विशेषकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में। इसलिए अवमानना क्षेत्राधिकार का प्रयोग केवल उन मामलों में किया जा सकता है जहाँ जानबूझकर और स्पष्ट रूप से न्यायालय की अवमानना करने का आचरण दिखाई दे। अटॉर्नी जनरल ने निष्कर्ष निकाला कि संबंधित लेख अवमानना न्यायालय अधिनियम, 1971 की धारा 15 के तहत आपराधिक अवमानना की श्रेणी में नहीं आता।

गौरतलब है कि अवमानना न्यायालय अधिनियम, 1971 की धारा 15 के तहत कुछ मामलों में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से पहले अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की सहमति आवश्यक होती है। अटॉर्नी जनरल द्वारा अनुमति से इनकार किए जाने के बाद वेंकटेश एस ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिका में न्यायालय के समक्ष दो महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं:

क्या अटॉर्नी जनरल द्वारा धारा 15 के तहत आपराधिक अवमानना कार्यवाही की अनुमति देने से इनकार करने वाला निर्णय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आता है?
क्या संबंधित लेख अपने आप में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही को उचित ठहराता है?

13 मई 2026 के अपने आदेश में न्यायालय ने दर्ज किया कि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने विचारार्थ एक नोट प्रस्तुत किया था। उस नोट का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने कहा कि पहले प्रश्न पर विभिन्न उच्च न्यायालयों के बीच भिन्न-भिन्न मत दिखाई देते हैं, इसलिए इस मुद्दे पर विस्तृत विचार आवश्यक है।

न्यायालय ने पाँचवें प्रतिवादी को सभी अनुमत माध्यमों से नोटिस जारी करते हुए मामले को 29 सितंबर 2026 के लिए सूचीबद्ध किया और अगली सुनवाई से पहले जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

मामले का विवरण:

वेंकटेश एस बनाम अटॉर्नी जनरल फॉर इंडिया एवं अन्य
दिल्ली हाईकोर्ट, W.P.(C) 6923/2024
न्यायमूर्ति: पुरुषेन्द्र कुमार कौरव
आदेश दिनांक: 13 मई 2026

याचिकाकर्ता वेंकटेश एस स्वयं न्यायालय में उपस्थित हुए। वहीं, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने अधिवक्ताओं रुख्मिणी बोबडे, अमित गुप्ता, सौरभ त्रिपाठी, शुभम शर्मा, उर्जा पांडेय, विनायक अरेन और ऐश्वर्या निगम के साथ प्रतिवादियों की ओर से पक्ष रखा।



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About:

Samriddhi is a legal scholar currently pursuing her LL.M. in Constitutional Law at the National Law ...Read more



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