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केजेएस सीमेंट शेयर विवाद में पवन कुमार अहलूवालिया को राहत नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने NCLAT आदेश बरकरार रखा

By Saket Sourav      13 May, 2026 06:29 PM      0 Comments
केजेएस सीमेंट शेयर विवाद में पवन कुमार अहलूवालिया को राहत नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने NCLAT आदेश बरकरार रखा

नई दिल्ली: Supreme Court of India ने केजेएस सीमेंट शेयरहोल्डिंग विवाद में पवन कुमार अहलूवालिया द्वारा दायर अपील खारिज कर दी है। इसके साथ ही अदालत ने National Company Law Appellate Tribunal (NCLAT) के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें विवादित शेयरहोल्डिंग बहाल करने का निर्देश दिया गया था।

यह फैसला दिल्ली हाई कोर्ट, National Company Law Tribunal (NCLT), NCLAT और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित कई कार्यवाहियों की श्रृंखला में नवीनतम न्यायिक घटनाक्रम माना जा रहा है। इन कार्यवाहियों में जालसाजी, अवैध शेयर ट्रांसफर, कॉरपोरेट अधिकारों के दुरुपयोग तथा कंपनी की संपत्तियों पर गैरकानूनी नियंत्रण स्थापित करने के आरोप शामिल हैं।

विवाद की शुरुआत केजेएस सीमेंट के संस्थापक केजेएस अहलूवालिया के निधन के बाद हुई, जिसके पश्चात कंपनी की शेयरहोल्डिंग और प्रबंधन संरचना पर उत्तराधिकार एवं नियंत्रण को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। इसके बाद मंजुला अहलूवालिया और हिमांगिनी सिंह ने स्वयं को क्लास-1 कानूनी उत्तराधिकारी बताते हुए कई कॉरपोरेट कार्रवाइयों को चुनौती दी, जिन्हें कथित रूप से पवन कुमार अहलूवालिया ने प्रबंध निदेशक के रूप में अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए अंजाम दिया था।

मुख्य आरोपों में एक विवादित गिफ्ट डीड का उपयोग तथा पावर ऑफ अटॉर्नी के कथित दुरुपयोग के जरिए बड़ी संख्या में शेयर ट्रांसफर करना शामिल था। मामले में जालसाजी, वित्तीय अनियमितताओं, अवैध बोर्ड प्रस्तावों और कंपनी के फंड्स के कथित डायवर्जन से जुड़े आरोप भी लगाए गए।

दिल्ली हाई कोर्ट में हुई कार्यवाही के दौरान कथित जालसाजी और वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित आपराधिक कार्यवाही एवं एफआईआर को रद्द करने की मांग वाली याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं। हाई कोर्ट ने कहा था कि आरोप केवल सिविल विवाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें आपराधिक जांच की आवश्यकता वाले गंभीर मुद्दे शामिल हैं, जैसे साजिश, दस्तावेजों की कथित फर्जीवाड़ा और वित्तीय गड़बड़ियां। अदालत ने हिमांगिनी सिंह के शिकायत आगे बढ़ाने के अधिकार को भी मान्यता दी और जांच जारी रखने की अनुमति दी।

इसके बाद शेयर ट्रांसफर से जुड़ा विवाद NCLAT के समक्ष पहुंचा। 11 मार्च 2026 के अपने आदेश में ट्रिब्यूनल ने विवादित गिफ्ट डीड और पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर दावा किए गए अधिकारों की वैधता की जांच की। ट्रिब्यूनल ने प्रथम दृष्टया कहा कि मध्य प्रदेश स्थित अचल संपत्तियों के प्रबंधन के लिए कथित रूप से निष्पादित पावर ऑफ अटॉर्नी का उपयोग दिल्ली स्थित कंपनी के शेयर ट्रांसफर के लिए नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर ट्रिब्यूनल ने 55,97,768 शेयर हिमांगिनी सिंह और मंजुला अहलूवालिया के पक्ष में बहाल करने का निर्देश दिया, जिससे कंपनी के नियंत्रण ढांचे पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा।

NCLAT के इस आदेश को चुनौती देते हुए पवन कुमार अहलूवालिया ने सिविल अपील संख्या 4298/2026 के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति B.V. Nagarathna और न्यायमूर्ति Ujjal Bhuyan की पीठ ने की। पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी।

अदालत ने अपने आदेश में कहा, “हमें impugned order में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखाई देता। अतः सिविल अपील खारिज की जाती है।”

13 अप्रैल 2026 के आदेश में यह भी निर्देश दिया गया कि लंबित सभी आवेदन भी निस्तारित माने जाएंगे।

अपील खारिज होने के बाद NCLAT द्वारा विवादित शेयरहोल्डिंग बहाल करने संबंधी निर्देश प्रभावी बने रहेंगे, जबकि जालसाजी और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े आपराधिक मामले एवं जांच संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष स्वतंत्र रूप से जारी रहेंगे।

केस शीर्षक: Pawan Kumar Ahluwalia v. Himangini Singh & Others [Civil Appeal No. 4298 of 2026]



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Saket is a law graduate from The National Law University and Judicial Academy, Assam. He has a keen ...Read more

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