5 जुलाई 2021 को सामाजिक कार्यकर्ता फादर स्टैन स्वामी का मुंबई के एक अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया। उस समय वे UAPA (Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967) के तहत गिरफ्तार थे और न्यायिक हिरासत में थे। उनकी मौत के बाद पूरे देश में यह बहस शुरू हो गई कि क्या UAPA बहुत सख्त कानून है और क्या इसमें बदलाव होना चाहिए।
यह सवाल आज भी उठता है। लेकिन किसी भी कानून को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि उसे बनाया क्यों गया था।
UAPA क्या है?
UAPA यानी गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967। संसद ने यह कानून इसलिए बनाया ताकि देश की एकता, अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ काम करने वाले लोगों और संगठनों पर कार्रवाई की जा सके। समय के साथ आतंकवाद का तरीका बदलता गया, इसलिए 2004, 2008, 2012 और 2019 में इस कानून में संशोधन किए गए।
आज UAPA भारत का सबसे बड़ाAnti-Terror Law माना जाता है। जब किसी मामले में आतंकवादी हमला, आतंकी संगठन से संबंध, हथियार, विस्फोटक, आतंकी फंडिंग या देश के खिलाफ हिंसक साजिश की जांच होती है, तब यह कानून लागू किया जाता है।
UAPA में क्या-क्या प्रावधान हैं?
इस कानून की कुछ धाराएं सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
धारा 15 बताती है कि Terrorist Act यानी आतंकवादी कृत्य क्या होता है।
धारा 17 आतंकी गतिविधियों के लिए पैसा जुटाने या पैसा देने को अपराध मानती है।
धारा 18 आतंकवादी साजिश या उसकी तैयारी करने पर कार्रवाई की अनुमति देती है।
धारा 38 और 39 किसी आतंकवादी संगठन की सदस्यता लेने या उसकी मदद करने से जुड़ी हैं।
सबसे ज्यादा चर्चाधारा 43D(5) की होती है। इसी धारा के कारण UAPA के मामलों में Bail आसानी से नहीं मिलती। अदालत पहले यह देखती है कि जांच एजेंसी के पास पहली नजर में ऐसे साक्ष्य हैं या नहीं, जिनसे मामला सही लगता हो। यदि अदालत को शुरुआती स्तर पर आरोप गंभीर लगते हैं, तो जमानत देना मुश्किल हो जाता है।
जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट क्या कहता है?
2019 में National Investigation Agency बनाम Zahoor Ahmad Shah Watali मामले में Supreme Court ने कहा कि UAPA के मामलों में Bail देते समय अदालत को सामान्य आपराधिक मामलों से अलग तरीका अपनाना होगा। यदि जांच एजेंसी के पास पहली नजर में पर्याप्त सामग्री है, तो अदालत जमानत देने में सावधानी बरतेगी।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसी आरोपी के अधिकार खत्म हो जाते हैं।
2021 में Union of India बनाम K.A. Najeeb मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि मुकदमा वर्षों तक शुरू ही नहीं होता या बहुत अधिक देरी होती है, तो Article 21 यानी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को देखते हुए अदालत Bail दे सकती है।
यानी सुप्रीम कोर्ट ने दोनों बातें साफ की हैं—राष्ट्रीय सुरक्षा भी जरूरी है और व्यक्ति के अधिकार भी।
क्या फादर स्टैन स्वामी का मामला पूरे कानून को गलत साबित करता है?
फादर स्टैन स्वामी की मौत निश्चित रूप से दुखद घटना थी। उनकी उम्र अधिक थी और वे कई बीमारियों से जूझ रहे थे। उनकी मृत्यु के बाद हिरासत में स्वास्थ्य सुविधाओं, बुजुर्ग आरोपियों के अधिकार और मामलों की जल्दी सुनवाई जैसे मुद्दे सामने आए।
लेकिन कानून के जानकारों का मानना है कि किसी एक या दो मामलों के आधार पर पूरे कानून का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
मान लीजिए किसी शहर में सड़क दुर्घटना हो जाए। इसका मतलब यह नहीं कि ट्रैफिक कानून खत्म कर दिए जाएं। जरूरत यह होती है कि उनका पालन सही तरीके से हो। ठीक उसी तरह यदि किसी मामले में जांच या प्रक्रिया में कमी रह जाती है, तो उसकी जांच होनी चाहिए। लेकिन इससे कानून की जरूरत खत्म नहीं हो जाती।
भारत में UAPA की जरूरत क्यों है?
भारत पिछले कई दशकों से आतंकवाद का सामना कर रहा है। 26/11 मुंबई हमला, संसद पर हमला, पुलवामा हमला और कई अन्य आतंकी घटनाएं इसका उदाहरण हैं।
आतंकवाद के मामलों की जांच सामान्य हत्या या चोरी के मामलों जैसी नहीं होती। इसमें विदेशी फंडिंग, डिजिटल चैट, बैंक रिकॉर्ड, एन्क्रिप्टेड मैसेज, हथियारों की सप्लाई और कई देशों से जुड़े लिंक की जांच करनी पड़ती है। इसलिए संसद ने UAPA और National Investigation Agency (NIA) Act, 2008 जैसे विशेष कानून बनाए।
क्या इस कानून में सुधार होना चाहिए?
हर कानून समय-समय पर बेहतर बनाया जा सकता है और UAPA भी इससे अलग नहीं है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि जांच तेजी से पूरी होनी चाहिए। मुकदमों की सुनवाई में वर्षों की देरी नहीं होनी चाहिए। बुजुर्ग और गंभीर बीमार आरोपियों के मामलों में अदालतों को प्राथमिकता से सुनवाई करनी चाहिए। जांच एजेंसियों को मजबूत और वैज्ञानिक साक्ष्य पेश करने चाहिए ताकि बेगुनाह लोगों को अनावश्यक परेशानी न हो।
निष्कर्ष
UAPA एक सख्त कानून जरूर है, लेकिन इसे सख्त इसलिए बनाया गया क्योंकि इसका इस्तेमाल आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों में होता है। किसी एक या दो चर्चित मामलों के आधार पर पूरे कानून को गलत कहना कानूनी रूप से उचित नहीं माना जा सकता।
जरूरत इस बात की है कि इस कानून का इस्तेमाल केवल उन मामलों में हो जहां मजबूत साक्ष्य मौजूद हों। जांच निष्पक्ष हो, अदालतें समय पर सुनवाई करें और संविधान के तहत हर आरोपी के अधिकारों का सम्मान किया जाए। यही संतुलन भारत के लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा, दोनों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।



