बिहार: बिहार के वैशाली जिले के हाजीपुर स्थित जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने 35 साल पुराने हत्या के प्रयास (Attempt to Murder) के एक मामले में 85 वर्षीय दीप राय को तीन साल के सश्रम कारावास (कड़ी मेहनत वाली जेल) की सजा सुनाई है। गांव में जमीन को लेकर हुए विवाद के दौरान हुई गोलीबारी के इस मामले में अदालत ने कुल पांच आरोपियों को दोषी ठहराया। सजा तय करते समय अदालत ने दीप राय की अधिक उम्र, शारीरिक कमजोरी और मुकदमे के असाधारण रूप से लंबे समय तक चलने को ध्यान में रखा।
यह मामला 10 दिसंबर 1992 की घटना से जुड़ा है। आरोप था कि गांव के रास्ते पर कांच के टुकड़े डालने को लेकर शुरू हुआ विवाद बाद में गोलीबारी तक पहुंच गया। इस संबंध में अदालत राय ने अगले दिन प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई थी। 18 मार्च 1993 को पुलिस ने आरोपपत्र (चार्जशीट) दाखिल किया। 31 मई 1993 को अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 148, 149 और 307 तथा शस्त्र अधिनियम (Arms Act) की धारा 27 के तहत मामला दर्ज कर सुनवाई शुरू की। मूल रूप से सात लोगों को आरोपी बनाया गया था, लेकिन मुकदमे के लंबे समय तक चलने के दौरान दो आरोपियों की मृत्यु हो गई, जिसके बाद पांच आरोपियों पर मुकदमा चला।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना की शुरुआत गांव के रास्ते के उपयोग को लेकर हुए विवाद से हुई थी। 10 दिसंबर 1992 की सुबह उदेश राय ने आरोपियों जंगी राय और सबल राय द्वारा सार्वजनिक रास्ते पर टूटे हुए कांच डालने का विरोध किया। इसके बाद आरोपी वहां से चले गए और कुछ समय बाद हथियारों के साथ लौटे। आरोप है कि उन्होंने गोलीबारी की, जिसमें शंभू राय, उदेश राय, अदालत राय और रामसखी देवी घायल हो गए। जांच के दौरान पास के खेत से .315 बोर के खाली कारतूस भी बरामद किए गए।
अपने पक्ष को साबित करने के लिए अभियोजन ने 10 गवाह पेश किए, जिनमें प्रत्यक्षदर्शी, घायल गवाह, बरामदगी के गवाह और इलाज करने वाले डॉक्टर शामिल थे। बचाव पक्ष ने कोई साक्ष्य पेश नहीं किया। जीवित आरोपियों के बयान 4 मई 2016 को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 के तहत दर्ज किए गए, जो घटना के लगभग 24 साल बाद हुआ। आरोपियों ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए खुद को झूठा फंसाया गया बताया।
अदालत ने घायल गवाहों की गवाही को भरोसेमंद और एक-दूसरे से मेल खाने वाली माना। अदालत ने कहा कि घायल गवाहों ने आरोपियों की पहचान की थी और उनकी बातों की पुष्टि मेडिकल रिपोर्ट से भी हुई, जिसमें चारों पीड़ितों को गोली लगने की बात सामने आई। अदालत ने State of U.P. v. Naresh, Jarnail Singh v. State of Punjab और Abdul Sayyed v. State of Madhya Pradesh मामलों का हवाला देते हुए कहा कि घायल गवाहों की गवाही का विशेष महत्व होता है और मजबूत विपरीत साक्ष्य के बिना उसे खारिज नहीं किया जा सकता। बचाव पक्ष ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सका।
धारा 307 IPC (हत्या के प्रयास) के आरोप पर अदालत ने कहा कि हत्या की मंशा का आकलन केवल चोटों की गंभीरता से नहीं, बल्कि पूरी घटना की परिस्थितियों से किया जाना चाहिए। Roshan Lal v. State of Haryana और Bipin Bihari v. State of M.P. मामलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि आरोपियों का हथियारों से लैस होकर आना और कई लोगों को गोली मारकर घायल करना स्पष्ट रूप से हत्या की मंशा और जानकारी को साबित करता है।
अदालत ने सभी पांच आरोपियों को दोषी ठहराया। 2 जून 2026 को हुई सजा सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि घटना को 35 वर्ष बीत चुके हैं, यह आरोपियों का पहला आपराधिक मामला है और उनकी उम्र 50 से 85 वर्ष के बीच है। वहीं अभियोजन पक्ष ने इसे समाज के खिलाफ गंभीर अपराध बताते हुए अधिकतम सजा की मांग की।
सजा तय करते समय अदालत ने विशेष रूप से दीप राय की उम्र और स्वास्थ्य स्थिति पर ध्यान दिया। अदालत के अनुसार, 85 वर्षीय दीप राय पूरी तरह शारीरिक रूप से कमजोर हैं। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में अधिकतम सजा देना उचित नहीं होगा, क्योंकि संभव है कि वह जेल में अधिक समय तक जीवित न रह सकें। हालांकि अपराध की गंभीरता को देखते हुए कुछ सजा देना जरूरी था।
इसी आधार पर दीप राय को धारा 307 IPC के तहत न्यूनतम तीन वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। इसके अलावा धारा 148 IPC और शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के तहत भी सजा दी गई, जो साथ-साथ चलेगी। अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि अधिकतम सजा तीन वर्ष की है और दीप राय पूरे मुकदमे के दौरान जमानत पर थे, इसलिए वे अपील दायर करने और उच्च न्यायालय से जमानत प्राप्त करने की शर्त पर मौजूदा जमानती बांड पर बने रह सकते हैं।
अन्य चार दोषियों—Nakeshwar Rai, Jagdish Rai, Naresh Rai और Nagdev Rai—को धारा 307 IPC के तहत 10-10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। साथ ही धारा 148 IPC और शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के तहत दी गई सजाएं भी साथ-साथ चलेंगी। अदालत ने कहा कि मामला लगभग 35 वर्षों तक लंबित रहा और यह लंबी कानूनी प्रक्रिया भी अपने आप में एक प्रकार की सजा रही है। इसी कारण अधिकतम सजा नहीं दी गई।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि आरोपियों द्वारा मुकदमे से पहले हिरासत में बिताई गई अवधि को धारा 428 CrPC के तहत समायोजित किया जाए। साथ ही जुर्माने की पूरी राशि पीड़ितों को धारा 357 CrPC के तहत मुआवजे के रूप में दी जाए।
इसके अतिरिक्त अदालत ने आदेश दिया कि फैसले की एक प्रति वैशाली जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के सचिव को भेजी जाए, ताकि धारा 357-A CrPC और बिहार पीड़ित मुआवजा योजना के तहत पीड़ितों को मुआवजा दिया जा सके। फैसले की एक प्रति वैशाली के जिला मजिस्ट्रेट को भी भेजने का निर्देश दिया गया।
मामला: State v. Sabal Rai and Others, Sessions Trial No. 191/1993, CNR: BRVA01-000006-1993।
