नई दिल्ली। भारतीय न्याय व्यवस्था में stare decisisअर्थात् नज़ीर (precedent) का सिद्धांत न्यायिक व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। इसी सिद्धांत के कारण समान परिस्थितियों वाले मामलों में एकरूपता, निश्चितता और न्यायिक स्थिरता बनी रहती है। हालांकि इस सिद्धांत का एक सीमित अपवाद भी है, जिसे Per Incuriam कहा जाता है। सुप्रीम कोर्ट नेParveen Kumar @ Parveen Chauhan बनाम State of Haryana एवं अन्य मामले में इस सिद्धांत की सीमाओं को एक बार फिर स्पष्ट करते हुए बताया है कि किसी न्यायिक निर्णय को Per Incuriamघोषित करने का अधिकार और आधार क्या है तथा किन परिस्थितियों में इसका प्रयोग किया जा सकता है।
यह निर्णय न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने 1 जुलाई 2026 को सुनाया। यद्यपि विवाद हरियाणा की रिमिशन (सजा में छूट) नीति से संबंधित था, लेकिन निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलूPer Incuriam सिद्धांत की व्यापक व्याख्या रहा।
क्या था मूल विवाद?
अपीलकर्ता का तर्क था कि उसकी समयपूर्व रिहाई (Premature Release) पर हरियाणा सरकार की वर्ष 2002 की रिमिशन नीति लागू होनी चाहिए, क्योंकि वह संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की संवैधानिक शक्ति के प्रयोग से बनाई गई थी। दूसरी ओर, राज्य सरकार का कहना था कि वर्ष 2008 की बाद की नीति लागू होगी, जो तत्कालीन दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धाराओं 432 और 433 के अंतर्गत जारी की गई थी।
इस विवाद के समाधान के दौरान सुप्रीम कोर्ट को अपने ही एक पूर्व निर्णयState of Haryana v. Raj Kumar (2021) की वैधता पर विचार करना पड़ा।
Raj Kumar (2021) निर्णय में समस्या क्या थी?
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि Raj Kumar (2021) में यह माना गया था कि वर्ष 2002 की हरियाणा रिमिशन नीति वैधानिक (Statutory) प्रकृति की थी। जबकि इससे पहले तीन न्यायाधीशों की पीठ State of Haryana v. Jagdish (2010) 4 SCC 216 में समान प्रकृति की नीति को संविधान के अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्यपाल की संवैधानिक शक्ति का प्रयोग माना जा चुका था।
न्यायालय ने कहा कि जब बड़ी पीठ पहले ही समान प्रश्न का उत्तर दे चुकी थी, तब समान शक्ति वाली बाद की पीठ उसके विपरीत निष्कर्ष नहीं दे सकती थी। इसी कारणRaj Kumar (2021) का निर्णय बड़ी पीठ के बाध्यकारी निर्णय के विपरीत पाया गया और उसे Per Incuriam घोषित कर दिया गया।
Per Incuriam क्या है?
Per Incuriam एक लैटिन शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है—"अनजाने में"या "कानून की अनदेखी करते हुए"।
भारतीय न्यायशास्त्र में इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई निर्णय केवल इसलिएPer Incuriam हो जाएगा क्योंकि वह गलत है। किसी निर्णय का गलत होना और उसका Per Incuriam होना, दोनों अलग-अलग अवधारणाएँ हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय में स्पष्ट किया कि Per Incuriamसिद्धांत, stare decisis के सामान्य नियम का एक अत्यंत सीमित अपवाद है और इसका प्रयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्धारित किए प्रमुख सिद्धांत
निर्णय में न्यायालय ने Per Incuriam से संबंधित स्थापित न्यायिक सिद्धांतों को क्रमबद्ध रूप से दोहराया।
पहला, कोई निर्णय Per Incuriam तब होगा जब उसका Ratio Decidendi (निर्णय का बाध्यकारी कानूनी सिद्धांत) समान या बड़ी पीठ के पहले से मौजूद बाध्यकारी निर्णय से मेल न खाता हो।
दूसरा, यदि निर्णय देते समय किसी महत्वपूर्ण वैधानिक प्रावधान, नियम या विनियम पर न्यायालय का ध्यान ही नहीं गया हो, तब भी वह निर्णय Per Incuriamमाना जा सकता है।
तीसरा, यह सिद्धांत केवल Ratio Decidendi पर लागू होता है, Obiter Dicta (अतिरिक्त टिप्पणियों) पर नहीं।
चौथा, यदि समान शक्ति (Co-equal Bench) की कोई पीठ पहले के निर्णय से असहमत है, तो उसे स्वयं विपरीत निर्णय देने के बजाय मामला बड़ी पीठ को भेजना चाहिए।
पाँचवां, किसी निर्णय की बाध्यकारी प्रकृति इस बात से तय नहीं होती कि उसमें कितने न्यायाधीशों ने कोई राय व्यक्त की, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह किसपीठ की शक्ति (Bench Strength) का निर्णय है।
छठा, केवल इसलिए कोई निर्णय Per Incuriamनहीं हो जाता कि उसने पुराने निर्णय का उल्लेख करने के बाद अलग निष्कर्ष निकाला हो। यदि निर्णय पढ़ने पर प्रत्यक्ष रूप से कोई टकराव दिखाई नहीं देता, तो अदालतों को उसे Per Incuriam मानने से बचना चाहिए।
न्यायिक अनुशासन क्यों महत्वपूर्ण है?
इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण संदेश न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि न्यायालयों की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वे पूर्व स्थापित नज़ीरों का सम्मान करें। यदि समान शक्ति वाली पीठें बार-बार अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाने लगें, तो कानून में अनिश्चितता पैदा होगी और नागरिकों के लिए यह समझना कठिन हो जाएगा कि लागू कानून वास्तव में क्या है।
इसी कारण भारतीय न्याय व्यवस्था में यह स्थापित सिद्धांत है कि छोटी पीठ बड़ी पीठ के निर्णय से बंधी होती है, जबकि समान शक्ति वाली पीठ यदि असहमत हो, तो उसे मामला बड़ी पीठ के समक्ष संदर्भित करना चाहिए।
इस निर्णय का प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि अपीलकर्ता के रिमिशन आवेदन पर वर्ष 2002 की नीति के अनुसार पुनर्विचार किया जाए। साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय Prospective अर्थात भविष्य के लिए लागू होगा और जिन मामलों में रिमिशन के आवेदन पहले ही अंतिम रूप से तय हो चुके हैं, वे दोबारा नहीं खोले जाएंगे।
निष्कर्ष
यह निर्णय केवल हरियाणा की रिमिशन नीति तक सीमित नहीं है। वास्तव में यह भारतीय न्यायशास्त्र में Precedent, Bench Strength, Judicial Discipline और Per Incuriam जैसे मूलभूत सिद्धांतों की पुनर्पुष्टि करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि Per Incuriamकोई ऐसा माध्यम नहीं है जिसके आधार पर किसी भी अप्रिय या विवादित निर्णय को दरकिनार किया जा सके। इसका प्रयोग केवल उन्हीं मामलों में होगा, जहाँ निर्णय किसी बाध्यकारी कानून अथवा समान या बड़ी पीठ के पूर्व निर्णय की स्पष्ट अनदेखी करते हुए दिया गया हो। यही सिद्धांत न्यायिक स्थिरता, कानूनी निश्चितता और संविधान द्वारा स्थापित न्यायिक अनुशासन की आधारशिला है।



