मुंबई: बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि पत्नी द्वारा रोज़मर्रा के घरेलू काम जैसे खाना बनाना या सफाई न करना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। अदालत ने इसी आधार पर फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए तलाक के आदेश को रद्द करते हुए पत्नी को ₹10,000 प्रतिमाह भरण-पोषण और ₹10,000 प्रतिमाह आवास के लिए देने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने 8 मई 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि,
“सिर्फ इस कारण कि पत्नी खाना नहीं बनाती या घर के काम नहीं करती, उसे क्रूरता नहीं कहा जा सकता। विवाह बराबरी की साझेदारी है, कोई सेवा अनुबंध नहीं, और पत्नी को नौकरानी नहीं माना जा सकता।”
दोनों पक्षों की शादी वर्ष 2002 में हुई थी। पति ने आरोप लगाया कि शादी के कुछ ही दिनों बाद विवाद शुरू हो गए और कुछ महीनों के भीतर पत्नी अपने मायके चली गई। वर्ष 2004 में पति, जो पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट है, ने क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की।
पति का आरोप था कि पत्नी का व्यवहार ठीक नहीं था, वह घर का काम नहीं करती थी, माता-पिता की बात नहीं मानती थी, रूखा व्यवहार करती थी, खाना बनाना नहीं जानती थी और उससे मानसिक तनाव हुआ।
वहीं पत्नी ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उससे घर के सारे काम कराए जाते थे, जिनमें बर्तन और कपड़े धोना, खाना बनाना और सफाई करना शामिल था। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसे बचा हुआ खाना खाने के लिए मजबूर किया जाता था। पत्नी ने कहा कि वह पति की वैध पत्नी है और उसे पति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के अनुरूप सम्मानजनक भरण-पोषण और आवास मिलना चाहिए।
साथ ही पत्नी ने भरण-पोषण और आवास के लिए अलग से याचिका भी दाखिल की थी।
साल 2010 में बांद्रा फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में तलाक का आदेश पारित कर दिया और पत्नी को भरण-पोषण देने से भी इनकार कर दिया। फैमिली कोर्ट ने पत्नी द्वारा जारी एक आर्ट एंड क्राफ्ट क्लास के विज्ञापन को उसकी आय का प्रमाण मान लिया था।
हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि पति द्वारा लगाए गए आरोप सामान्य वैवाहिक जीवन में शुरुआती समायोजन के दौरान होने वाले सामान्य विवादों जैसे थे और इन्हें क्रूरता का रूप देना गलत था। अदालत ने माना कि पत्नी ने पति और उसके परिवार द्वारा उत्पीड़न के कारण वैवाहिक घर छोड़ा था।
भरण-पोषण के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि सिर्फ आर्ट एंड क्राफ्ट क्लास के विज्ञापन के आधार पर पत्नी को आत्मनिर्भर मानना उचित नहीं था। अदालत ने स्पष्ट किया:
“केवल किसी कौशल का होना या कभी-कभार कोई काम करना, स्थायी और पर्याप्त आय का स्रोत नहीं माना जा सकता।”
अदालत ने यह भी माना कि पति एक योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट है और पत्नी का भरण-पोषण करने में सक्षम है। इसलिए अदालत ने पति को ₹10,000 प्रतिमाह भरण-पोषण और ₹10,000 प्रतिमाह आवास के लिए देने का निर्देश दिया।
इसके साथ ही हाई कोर्ट ने 2010 में फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक और भरण-पोषण से इनकार करने वाले आदेश को रद्द कर दिया।
मामले का विवरण:
- अदालत: बॉम्बे हाई कोर्ट
- पीठ: न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे
- फैसला: 8 मई 2026