अमरोहा की एक महिला ने आरोप लगाया कि जब वह करीब 15 साल की नाबालिग थी, तब 2015 में उसकी शादी करा दी गई। 2016 में उसके पति ने उसे तीन तलाक दे दिया।
महिला का कहना है कि दोबारा उसी पति से शादी करने के लिए उसे निकाह हलाला करने के लिए मजबूर किया गया। आरोप है कि इस प्रक्रिया के नाम पर नवंबर 2016 में उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए। उस समय वह नाबालिग थी। बाद में 2017 में उसकी दोबारा पहले पति से शादी करा दी गई।
इसके बाद पति ने दूसरी शादी कर ली। लेकिन जब दूसरी पत्नी से बच्चा नहीं हुआ, तो 2021 में उसने पहली पत्नी से फिर संबंध बनाने की कोशिश की। महिला का आरोप है कि इस बार उससे कहा गया कि क्योंकि उसे दो बार तलाक हो चुका है, इसलिए दोबारा दो बार हलाला करना पड़ेगा।
महिला के मुताबिक, फरवरी 2025 में इसी हलाला के नाम पर उसके साथ gang rape किया गया। उसे जान से मारने की धमकी भी दी गई और बाद में एक फर्जी निकाह भी कराया गया ताकि उसे लगे कि उसकी शादी कानूनी तरीके से हो गई है।
इसी मामले में दर्ज FIR को रद्द कराने के लिए नौ आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
आरोपियों ने कोर्ट में क्या कहा?
आरोपियों की तरफ से कहा गया कि—
- 2016 में तीन तलाक उस समय के Personal Law के अनुसार मान्य था।
- निकाह हलाला मुस्लिम Personal Law का हिस्सा है।
- नाबालिग की शादी Personal Law के अनुसार पूरी तरह Invalid (void) नहीं बल्कि Voidable मानी जाती है। यानी लड़की अगर बालिग होने के बाद एक साल के भीतर शादी को चुनौती नहीं देती, तो शादी वैध मानी जाएगी।
- कुछ आरोपियों की भूमिका सिर्फ निकाह कराने या रिश्तेदार होने तक सीमित थी, इसलिए उनके खिलाफ FIR रद्द होनी चाहिए।
- यह मामला बेटी की कस्टडी और संपत्ति के विवाद की वजह से दर्ज कराया गया है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चारों याचिकाएं खारिज कर दीं।
कोर्ट ने साफ कहा कि जब मामला Criminal Law का हो, तब Personal Law या किसी धार्मिक रस्म का सहारा लेकर अपराध से बचा नहीं जा सकता।
मतलब अगर शादी, तलाक या कोई धार्मिक परंपरा किसी धर्म में मान्य भी हो, लेकिन उसकी आड़ में rape, gang rape, cruelty या कोई दूसरा अपराध किया जाता है, तो उस पर सीधे Criminal Law लागू होगा।
POCSO को लेकर कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि अगर किसी नाबालिग लड़की के साथ हलाला के नाम पर शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं, तो वह सीधे POCSO Act के दायरे में आएगा।
यह मायने नहीं रखता कि लड़की दोबारा शादी करना चाहती थी या नहीं। अगर उसकी उम्र 18 साल से कम थी, तो कानून उसे विशेष सुरक्षा देता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला
हाईकोर्ट ने Independent Thought v. Union of India के फैसले का जिक्र किया।
उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ भी यौन संबंध Personal Law की आड़ में सुरक्षित नहीं हो सकते।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि 2016 की घटना पहली नजर में Statutory Rape और POCSO Act के तहत अपराध बनती है।
2025 की घटना पर कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि 2025 में जब महिला बालिग थी, तब भी लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं।
कोर्ट के मुताबिक, पहली नजर में ये आरोप "अंतरात्मा को झकझोरने वाले" हैं और Gang Rape के आरोपों की पूरी जांच होना जरूरी है।
बाकी आरोपियों को क्यों राहत नहीं मिली?
कुछ आरोपियों ने कहा कि उनकी भूमिका बहुत छोटी थी।
लेकिन कोर्ट ने कहा कि अभी यह जांच का विषय है कि कौन Abettor था, कौन Conspirator था और किसने क्या भूमिका निभाई।
इस शुरुआती चरण में FIR रद्द नहीं की जा सकती। पहली नजर में सभी आरोपी एक ही criminal enterprise का हिस्सा दिखाई देते हैं।
FIR में कौन-कौन से कानून लगाए गए हैं?
इस मामले में BNS की कई धाराएं लगाई गई हैं, जिनमें मुख्य रूप से—
- Cruelty
- Rape
- Gang Rape
- Criminal Intimidation
- Criminal Conspiracy
से जुड़े प्रावधान शामिल हैं।
इसके अलावा POCSO Act और Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 के प्रावधान भी लगाए गए हैं।
कोर्ट ने क्या नहीं कहा?
हाईकोर्ट ने यह फैसला निकाह हलाला सही है या गलत, इस सवाल पर नहीं दिया।
कोर्ट ने सिर्फ इतना कहा कि अगर किसी धार्मिक रस्म या परंपरा की आड़ में किसी महिला या नाबालिग के साथ अपराध होता है, तो उस मामले में Criminal Law ही लागू होगा।
आगे क्या होगा?
अब पुलिस इस मामले की जांच जारी रखेगी।
हाईकोर्ट ने आरोपियों को मिली अंतरिम राहत भी खत्म कर दी है।
इसके बाद जांच पूरी होगी, फिर कोर्ट में ट्रायल चलेगा। आरोप साबित होते हैं या नहीं, इसका अंतिम फैसला ट्रायल के बाद ही होगा।
नोट: यह मामला अभी विचाराधीन (sub judice) है। ऊपर दी गई जानकारी अदालत में दर्ज आरोपों, न्यायिक कार्यवाही और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कोर्ट रिकॉर्ड पर आधारित है। किसी भी आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जाता, जब तक अदालत ट्रायल के बाद ऐसा फैसला न दे।



